📅 11 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- भारत में 22% माताएं गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं।
- 14-16% महिलाएं टोकोफोबिया यानी डिलीवरी के डर से जूझती हैं, जो पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है।
- डिलीवरी के बाद 70-80% मांएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है।
📋 इस खबर में क्या है
मां बनना, एक औरत के जीवन का सबसे खूबसूरत अनुभव माना जाता है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि इस दौरान एक मां पर क्या बीतती है? शायद नहीं। अब एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। भारत में 22% माताएं डिप्रेशन का शिकार हैं। ‘परफेक्ट मां’ बनने का प्रेशर इतना ज्यादा है कि वे मानसिक रूप से बीमार हो रही हैं। ये आंकड़े नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, अमेरिका ने जारी किए हैं।
यह खबर HeadlinesNow.in के दर्शकों के लिए है, ताकि आप समझ सकें कि एक मां किन मुश्किलों से गुजरती है। 11 अप्रैल को ‘नेशनल सेफ मदरहुड डे’ था। इस मौके पर यह जानना जरूरी है कि सुरक्षित मातृत्व का मतलब सिर्फ स्वस्थ बच्चे का जन्म ही नहीं है, बल्कि मां की मानसिक सेहत भी उतनी ही जरूरी है।
क्या है ‘पॉजिटिव टॉक्सिसिटी’?
प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन जैसे हॉर्मोन में उतार-चढ़ाव होता है। इसका सीधा असर दिमाग पर पड़ता है। ऊपर से, हर समय खुश रहने का दबाव। नई मां अपनी असली भावनाओं को दबा देती है, जिससे चिंता और थकान महसूस होती है। 23% माताएं ‘पॉजिटिव टॉक्सिसिटी’ से प्रभावित हैं। ये एक बड़ी समस्या है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्भवती महिला पर हर वक्त खुश रहने का दबाव नहीं डालना चाहिए। अगर एंग्जायटी ज्यादा हो तो डॉक्टर के साथ मनोवैज्ञानिक की भी मदद लेनी चाहिए।
डिलीवरी का डर: टोकोफोबिया
कुछ महिलाओं को डिलीवरी का डर सताता है। इसे टोकोफोबिया कहते हैं। करीब 14-16% महिलाएं इस डर से जूझती हैं। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। कई महिलाएं तभी तो सी-सेक्शन का विकल्प चुनती हैं। परिवार का सपोर्ट न मिलना, अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी, लड़का होने का दबाव और 35 साल की उम्र के बाद यह तनाव और बढ़ जाता है।
डॉक्टरों का कहना है कि डिलीवरी की प्रक्रिया और पेन मैनेजमेंट पर बात करनी चाहिए। एंटीनेटल क्लासेस, काउंसलिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डर को कम किया जा सकता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ज़रूरी है।
ब्रेस्टफीडिंग की परेशानी
शिशु के लिए पहले 6 महीने तक सिर्फ स्तनपान कराने की सलाह दी जाती है। लेकिन, कई महिलाएं चाहकर भी ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं: अच्छी डाइट की कमी, पीसीओएस, थायरॉयड, डायबिटीज, ब्रेस्ट सर्जरी, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन की कमी, तनाव या डिलीवरी के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग। डिलीवरी के बाद कम पानी पीना भी एक बड़ी वजह है।
अगर ब्रेस्टफीडिंग में दिक्कत हो तो फॉर्मूला फीडिंग एक विकल्प है। बस, बच्चा भूखा नहीं रहना चाहिए। इसकी मात्रा और देने का तरीका पीडियाट्रिशियन से ज़रूर डिस्कस कर लें।
डिप्रेशन: नवजात से दूरी
डिलीवरी के बाद 70-80% महिलाएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं। इसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है, जो आमतौर पर 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। लेकिन, अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है। यह गंभीर है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों से सलाह लेना ज़रूरी है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को इस दिशा में काम करना चाहिए।
आगे क्या होगा?
यह जरूरी है कि हम माताओं के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करें। उन्हें सपोर्ट करें और उन्हें यह बताएं कि वे अकेली नहीं हैं।
🔍 खबर का विश्लेषण
यह खबर आंखें खोलने वाली है। हमें यह समझना होगा कि मां बनना आसान नहीं है। महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए सपोर्ट की जरूरत है। सरकार और समाज दोनों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं कर पाएंगे।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ पॉजिटिव टॉक्सिसिटी क्या है?
प्रेगनेंसी के दौरान हर समय खुश रहने का दबाव पॉजिटिव टॉक्सिसिटी कहलाता है। इससे महिलाएं अपनी असली भावनाओं को दबा देती हैं, जिससे चिंता और थकान महसूस होती है।
❓ टोकोफोबिया क्या है?
टोकोफोबिया डिलीवरी का डर है। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। इससे महिलाएं सी-सेक्शन का विकल्प चुनती हैं।
❓ बेबी ब्लूज क्या है?
डिलीवरी के बाद 70-80% महिलाएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है।
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Published: 11 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow.in

