📅 07 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- मध्य प्रदेश में गोवंशीय और भैंसवंशीय पशुओं को अलग-अलग रंगों के टैग लगाए जाएंगे।
- टैगिंग से बेसहारा, पालतू और गोशाला के पशुओं की पहचान आसान हो जाएगी।
- प्रदेश में 5 हजार से ज्यादा क्षमता वाली बड़ी गोशालाएं स्थापित की जा रही हैं।
📋 इस खबर में क्या है
भोपाल, 7 अप्रैल 2026: मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश में निराश्रित पशुओं की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए एक नई पहल शुरू करने जा रही है। अब राज्य में गोवंशीय और भैंसवंशीय पशुओं को अलग-अलग रंगों के टैग लगाए जाएंगे। इस योजना का उद्देश्य पालतू, बेसहारा और गोशाला के पशुओं की पहचान करना है ताकि उनकी बेहतर देखभाल की जा सके और किसानों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि सरकार ने केंद्र सरकार को इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा था, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। केंद्र सरकार जल्द ही प्रदेश को अलग-अलग रंगों के टैग उपलब्ध कराएगी। इन टैगों के लगने से पशुओं की पहचान आसान हो जाएगी और आम लोग भी रंग के आधार पर यह जान सकेंगे कि कोई पशु बेसहारा है या पालतू। पालतू पशुओं के टैग से उनके मालिक की पहचान भी हो सकेगी, जिससे उन्हें छोड़ने वालों पर कार्रवाई की जा सकेगी। इस योजना से प्रदेश में पशु प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
पशुगणना: आंकड़े और चुनौतियां
मंत्री पटेल ने बताया कि मध्य प्रदेश में गोवंश और भैंसवंशीय नस्ल के लगभग 2 करोड़ 90 लाख जानवर हैं। इनमें से 1 करोड़ 57 लाख गोवंश हैं, जबकि बाकी भैंसवंशीय हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रदेश में अच्छी नस्ल के जानवरों की संख्या कम है, लगभग 30% से ज्यादा नहीं। बाकी 70% देशी नस्ल की अवर्णित गायें हैं। सरकार अब इन देशी नस्लों के सुधार के लिए काम करेगी, ताकि दूध उत्पादन को बढ़ाया जा सके।
यहाँ एक बात ध्यान देने वाली है कि मध्य प्रदेश में पशुओं की संख्या गुजरात से अधिक होने के बावजूद, वहां दुग्ध उत्पादन अधिक है। इसकी वजह यह है कि गुजरात में गाय और भैंसें बेहतर नस्ल की हैं, जो ज्यादा दूध देती हैं। मध्य प्रदेश में कमजोर नस्ल के पशुओं की बड़ी संख्या है, जो एक चुनौती है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार नस्ल सुधार पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
स्वावलंबी गोशालाएं: नस्ल सुधार और आय के अवसर
सरकार प्रदेश में स्वावलंबी गोशालाओं को बढ़ावा दे रही है। इन गोशालाओं में नस्ल सुधार एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ भी होगा। अगर कोई गोशाला 25 हजार गायें रखती है और सालभर में डेढ़ से दो हजार अच्छी नस्ल की बछिया तैयार कर लेती है, तो आने वाले तीन वर्षों में उसे अच्छा आर्थिक लाभ मिल सकता है। एक अनुमान के अनुसार, यदि एक गाय की कीमत एक लाख रुपए मानी जाए, तो गोशाला को करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक की आय हो सकती है।
गोशालाओं को पर्यटन से जोड़ने की योजना
स्वावलंबी गोशालाओं की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार कई अन्य योजनाएं भी चला रही है। इनमें सोलर प्लांट, ब्रीडिंग, दुग्ध उत्पादन, सीएनजी निर्माण और खाद उत्पादन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, गोशालाओं को पर्यटन से भी जोड़ा जाएगा। यदि कोई गोशाला किसी नदी के किनारे स्थित है, तो वहां पर्यटकों के लिए हट्स बनाए जा सकते हैं और बोटिंग जैसी सुविधाएं शुरू की जा सकती हैं। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे की व्यवस्था भी की जाएगी, जिससे पर्यटक वहां रुक सकें और गोशाला की आमदनी में बढ़ोतरी हो सके। सरकार का मानना है कि ग्रामीण पर्यटन की अवधारणा तेजी से बढ़ रही है और इसका लाभ गोशालाओं को मिलेगा।
बड़ी गोशालाओं की स्थापना
पशुपालन मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि प्रदेश में स्वावलंबी गोशालाओं की स्थापना नीति-2025 लागू की गई है। इसके अंतर्गत नगरीय क्षेत्रों में उपलब्ध गोवंश के आश्रय और भरण-पोषण के लिए 5 हजार से ज्यादा क्षमता वाली बड़ी गोशालाएं स्थापित की जा रही हैं। आगर मालवा, इंदौर, ग्वालियर और उज्जैन जिलों में आदर्श गोशालाएं स्थापित की जा रही हैं। सरकार की इस पहल से निराश्रित पशुओं की समस्या को कम करने और पशुपालन को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। यह राष्ट्रीय स्तर पर भी एक मॉडल बन सकता है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन को इससे प्रेरणा मिलेगी। राष्ट्रीय नीतियों में बदलाव की भी संभावना है।
🔍 खबर का विश्लेषण
मध्य प्रदेश सरकार की यह पहल सराहनीय है। रंगीन टैगिंग से पशुओं की पहचान आसान होगी और निराश्रित पशुओं की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी। गोशालाओं को बढ़ावा देने और पर्यटन से जोड़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। हालांकि, योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने और नस्ल सुधार पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ रंगीन टैग लगाने का उद्देश्य क्या है?
रंगीन टैग लगाने का मुख्य उद्देश्य पालतू, बेसहारा और गोशाला के पशुओं की पहचान करना है, जिससे उनकी बेहतर देखभाल की जा सके।
❓ प्रदेश में कुल कितने पशु हैं?
प्रदेश में गोवंश और भैंसवंशीय नस्ल के लगभग 2 करोड़ 90 लाख जानवर हैं, जिनमें से 1 करोड़ 57 लाख गोवंश हैं।
❓ स्वावलंबी गोशालाओं को कैसे बढ़ावा दिया जा रहा है?
स्वावलंबी गोशालाओं को बढ़ावा देने के लिए नस्ल सुधार, दुग्ध उत्पादन, सीएनजी निर्माण, खाद उत्पादन और पर्यटन जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
❓ बड़ी गोशालाएं कहां स्थापित की जा रही हैं?
5 हजार से ज्यादा क्षमता वाली बड़ी गोशालाएं आगर मालवा, इंदौर, ग्वालियर और उज्जैन जिलों में स्थापित की जा रही हैं।
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Published: 07 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow.in

