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भोपाल: BOI मैनेजर और साथी को लोन घोटाले में 7 साल की जेल

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राष्ट्रीय
📅 15 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow Desk
भोपाल: BOI मैनेजर और साथी को लोन घोटाले में 7 साल की जेल - HeadlinesNow Hindi News

🔑 मुख्य बातें

  • BOI के ब्रांच मैनेजर और सहयोगी को लोन घोटाले में 7 साल की जेल हुई।
  • आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन बांटे और पैसे निकाले।
  • CBI जांच में ‘मेसर्स विजन कंप्यूटर’ के नाम पर फर्जी लोन का खुलासा हुआ।

भोपाल, 15 अप्रैल 2026: बैंक ऑफ इंडिया (BOI) की एक शाखा में हुए लोन घोटाले के मामले में CBI अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मिसरोद शाखा के तत्कालीन ब्रांच मैनेजर पीयूष चतुर्वेदी और उनके सहयोगी मोहन सिंह सोलंकी को दोषी करार देते हुए 7-7 साल की जेल की सजा सुनाई है। यह फैसला अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश नीलम शुक्ला की अदालत ने सुनाया है।

यह मामला जुलाई 2014 का है, जब बैंक ऑफ इंडिया की मिसरोद शाखा में पीयूष चतुर्वेदी ब्रांच मैनेजर के पद पर थे। आरोप है कि उन्होंने अपने साथी मोहन सिंह सोलंकी के साथ मिलकर कई लोगों और कंपनियों के नाम पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन बांटे। आपको बता दें कि इन लोन के बारे में असली खाताधारकों को पता भी नहीं था। आरोपियों ने मिलीभगत कर लोन की रकम निकाल ली। इस घोटाले की शिकायत 2016 में CBI की एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) भोपाल को मिली, जिसके बाद जांच शुरू हुई।

विजन कंप्यूटर का फर्जी लोन

जांच में पता चला कि आरोपियों ने ‘मेसर्स विजन कंप्यूटर’ के नाम पर 12.50 लाख रुपये का लोन स्वीकृत किया था। इसके लिए जाली दस्तावेज बनाए गए थे। फिर यह पैसा खाताधारक को बिना बताए मोहन सिंह सोलंकी की एक दूसरी कंपनी के खाते में ट्रांसफर कर दिया गया। CBI ने इस मामले में IPC की धारा 120बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था।

अदालत ने बढ़ाई धाराएं

लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत को और भी सबूत मिले। इसके बाद अदालत ने धारा 467, 468 और 471 को भी शामिल किया। इन्हीं धाराओं के तहत आरोपियों को दोषी पाया गया। अदालत ने अलग-अलग धाराओं में सजा सुनाई है। धारा 420 में 5-5 साल की कैद और 5-5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। वहीं, धारा 467 में 7-7 साल की कैद और 5-5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। धारा 468 और 471 में भी 5-5 साल की कैद और 5-5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बैंकों में होने वाले घोटालों को उजागर करता है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि लोगों का बैंकों पर भरोसा बना रहे। राष्ट्रीय सुरक्षा को भी ऐसे घोटालों से खतरा होता है। इसीलिए सरकार को इस दिशा में और कड़े कदम उठाने चाहिए। वहीं दूसरी तरफ इस फैसले से यह भी साफ होता है कि कानून से कोई नहीं बच सकता।

आगे क्या होगा?

अब देखना यह है कि क्या आरोपी इस फैसले के खिलाफ अपील करते हैं या नहीं। लेकिन इस मामले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। — और ये बात अहम है — यह राष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल कायम करने वाला फैसला है।

🔍 खबर का विश्लेषण

यह फैसला बैंकों में फैले भ्रष्टाचार पर एक कड़ा प्रहार है। इससे यह संदेश जाता है कि ऐसे मामलों में शामिल लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। हालांकि, यह भी सोचने वाली बात है कि क्या सिर्फ सजा ही काफी है? क्या बैंकों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए और सख्त कदम उठाने की जरूरत नहीं है? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर सरकार और regulatory bodies को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

❓ यह घोटाला कब हुआ था?

यह घोटाला जुलाई 2014 में हुआ था, जब पीयूष चतुर्वेदी बैंक ऑफ इंडिया की मिसरोद शाखा में ब्रांच मैनेजर थे।

❓ शिकायत किसने की थी?

इस घोटाले की शिकायत 2016 में CBI की एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) भोपाल को मिली थी, जिसके बाद जांच शुरू हुई।

❓ आरोपियों पर कौन-कौन सी धाराएं लगी हैं?

आरोपियों पर IPC की धारा 120बी, 420, 467, 468, 471 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगी हैं।

❓ अदालत ने क्या फैसला सुनाया?

अदालत ने ब्रांच मैनेजर पीयूष चतुर्वेदी और उनके सहयोगी मोहन सिंह सोलंकी को 7-7 साल की जेल की सजा सुनाई है।

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Published: 15 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow.in

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