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पैलेट गन प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, नियमों पर सवाल

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राष्ट्रीय
📅 31 जुलाई 2026 | HeadlinesNow Desk
पैलेट गन प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, नियमों पर सवाल - HeadlinesNow Hindi News

🔑 मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की याचिका को अस्पष्ट बताया, क्योंकि मौजूदा पुलिस नियमों को चुनौती नहीं दी गई है।
  • अदालत ने NEET प्रदर्शनों के दौरान घायल हुए लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने और RAF के हथियारों का रिकॉर्ड रखने का निर्देश दिया।

जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट गन से घायल हुए प्रशांत कुमार और शेख इरशाद मंसूरी जैसे पीड़ितों के लिए यह ख़बर किसी झटके से कम नहीं. देश की सर्वोच्च अदालत ने पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की याचिका को सीधे खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट कहना है कि जब तक मौजूदा नियम सुरक्षा एजेंसियों को विशेष परिस्थितियों में भीड़ नियंत्रित करने के लिए इन हथियारों के उपयोग की अनुमति देते हैं, तब तक इन पर रोक नहीं लग सकती.

न्यायालय ने यह ज़रूर साफ किया कि अगर पैलेट गन के गलत इस्तेमाल का कोई विशिष्ट आरोप सामने आता है, तो उसकी जाँच हर मामले के तथ्यों के आधार पर अलग से की जाएगी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने NEET प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रुख अपनाया.

जंतर-मंतर पर घटना और कोर्ट का निर्देश

अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि जंतर-मंतर पर तैनात द्रुत कार्य बल (RAF) द्वारा हथियारों के उपयोग का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए. दरअसल, 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हुई झड़प में सिंह और मंसूरी जैसे कई लोग छर्रे लगने से घायल हुए थे. याचिकाकर्ताओं की वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किलों के शरीर से धातुयुक्त छर्रे निकाले गए हैं. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका इरादा RAF के शस्त्रागार में पैलेट गन की मौजूदगी पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि उस विशेष घटना में धातुयुक्त छर्रों के इस्तेमाल पर आपत्ति है.

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को भी यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल हुए प्रशांत कुमार, शेख इरशाद मंसूरी और अन्य को बेहतर चिकित्सा उपचार मिले. यह एक मानवीय कदम है, लेकिन पैलेट गन के दीर्घकालिक इस्तेमाल पर कोई ठोस रोक लगाने से अदालत ने किनारा किया है.

नियमों पर आधारित अदालत की दलीलें

न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट रूप से कहा कि पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध का अनुरोध ‘अस्पष्ट’ है. इसकी वजह यह है कि याचिका में उन पुलिस नियमों को चुनौती नहीं दी गई है, जो ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की इजाज़त देते हैं. पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) की परामर्शिका के मुताबिक, पुलिस को कुछ असाधारण परिस्थितियों में पैलेट गन का इस्तेमाल करने का अधिकार है. ग्रोवर ने इस पर चिंता जताई कि ऐसे नियम सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और उन्होंने पीठ से केंद्र सरकार को इन्हें अदालत के रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश देने का अनुरोध किया. यह सवाल जायज़ है कि जब नियम ही स्पष्ट न हों, तो नागरिक उन पर सवाल कैसे उठाएं?

पीठ ने इस बात पर अपनी सहमति दी कि वह किसी विशेष घटना में पैलेट गन के इस्तेमाल की वैधता की जांच के लिए तैयार है, लेकिन पूरे देश में इन पर प्रतिबंध लगाने का रास्ता आसान नहीं बताया. यह एक पेचीदा कानूनी दांवपेंच है, जहां याचिकाकर्ताओं को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन साबित करने के लिए उन मौजूदा प्रावधानों को चुनौती देनी होगी, जो पैलेट गन के उपयोग की अनुमति देते हैं.

आगे की राह और राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद समेत पैलेट गन से घायल हुए दो व्यक्तियों ने कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए धातुयुक्त पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की अपील की थी. उनकी याचिका पर केंद्र सरकार और RAF के पुलिस महानिरीक्षक को नोटिस जारी किया गया है. यह देखना होगा कि इस नोटिस के जवाब में सरकार क्या पक्ष रखती है और क्या भविष्य में इन नियमों को चुनौती देने का कोई स्पष्ट मार्ग प्रशस्त होता है या नहीं.

अदालत का यह रुख राष्ट्रीय सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के बीच संतुलन साधने की कोशिश मालूम होता है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए यह एक निराशाजनक फैसला है, जो अक्सर पैलेट गन को कम घातक हथियार मानने से इनकार करते रहे हैं. इस फैसले ने एक बात तो साफ कर दी, कि पैलेट गन के पूर्ण प्रतिबंध की लड़ाई लंबी और कानूनी दांवपेंच से भरी होगी, जहाँ सीधे नियमों को चुनौती देना ही एकमात्र रास्ता है.

🔍 खबर का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध के समर्थकों के लिए एक झटका है. यह दर्शाता है कि अदालत भीड़ नियंत्रण के लिए सुरक्षा बलों के पास मौजूद विकल्पों को अभी भी ज़रूरी मानती है. हालांकि, गलत इस्तेमाल की जांच की बात पुलिस के लिए जवाबदेही तय करती है. इस फैसले से पैलेट गन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से बंद कराने की लड़ाई और लंबी हो सकती है, जिसमें सीधा नियमों को चुनौती देना ही एकमात्र रास्ता बचता है.

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

❓ सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया?

अदालत ने कहा कि मौजूदा पुलिस नियम विशेष परिस्थितियों में पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं. याचिका में इन नियमों को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए पूर्ण प्रतिबंध का अनुरोध ‘अस्पष्ट’ माना गया.

❓ किस घटना के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया?

यह फैसला NEET प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट गन के इस्तेमाल से संबंधित याचिका पर आया है. इसमें कुछ प्रदर्शनकारी घायल हुए थे.

❓ घायल हुए लोगों के लिए अदालत ने क्या निर्देश दिए हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल हुए प्रशांत कुमार, शेख इरशाद मंसूरी और अन्य पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा उपचार उपलब्ध कराया जाए.

❓ क्या पैलेट गन के गलत इस्तेमाल पर कोई कार्रवाई हो सकती है?

हाँ, अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैलेट गन के गलत इस्तेमाल के किसी विशेष आरोप की जांच मामला-दर-मामला तथ्यों के आधार पर की जा सकती है. केंद्र सरकार को RAF के हथियारों के उपयोग का रिकॉर्ड रखने का भी निर्देश दिया गया है.

❓ अगर कोई पैलेट गन पर प्रतिबंध चाहता है, तो उसे क्या करना होगा?

न्यायमूर्ति बागची के अनुसार, यदि पैलेट गन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से बंद करवाना है, तो याचिकाकर्ताओं को सीधे उन पुलिस नियमों को चुनौती देनी होगी जो इसके उपयोग की अनुमति देते हैं, यह तर्क देते हुए कि वे जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन करते हैं.

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Published: 31 जुलाई 2026 | HeadlinesNow.in

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