📅 19 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- भारत और रूस के बीच सैन्य समझौता लागू, दोनों देश एक-दूसरे की जमीन पर सैनिक तैनात कर सकेंगे।
- उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जापान ने हथियार निर्यात नीति में किया बड़ा बदलाव।
📋 इस खबर में क्या है
क्या भारत और रूस के बीच सैन्य संबंध और भी गहरे होने वाले हैं? जवाब है, हाँ! दोनों देशों ने एक ऐसा समझौता किया है, जिससे 3000 सैनिकों तक की तैनाती एक-दूसरे की ज़मीन पर हो सकेगी। यह कोई मामूली बात नहीं है — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं।
सैन्य सहयोग का नया अध्याय
रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट (RELOS) नामक यह रक्षा समझौता अब ज़मीनी स्तर पर लागू हो गया है। इसका मतलब है कि भारत और रूस, दोनों ही देश एक-दूसरे के सैन्य बेस, एयरबेस और बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेंगे। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि पांच युद्धपोत और दस सैन्य विमानों की तैनाती की अनुमति भी मिल गई है। इससे सैन्य संचालन और साजो-सामान की आपूर्ति में काफ़ी आसानी होगी।
इस समझौते में सिर्फ़ सैनिकों की तैनाती ही नहीं, बल्कि ईंधन, पानी, मरम्मत और तकनीकी संसाधनों जैसी ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति भी शामिल है। यानी, एक-दूसरे को हर तरह की मदद पहुँचाई जाएगी। विमानों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल और उड़ान से जुड़ी सेवाएं भी मिलेंगी। यह समझौता फरवरी 2025 में हुआ था और दिसंबर 2025 में रूस ने इसे हरी झंडी दी थी। फिलहाल, यह पाँच साल के लिए है, लेकिन आपसी सहमति से इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
सबसे अहम बात यह है कि यह समझौता युद्ध के लिए नहीं है। इसका इस्तेमाल सिर्फ़ शांति के समय ट्रेनिंग, संयुक्त अभ्यास और लॉजिस्टिक सहयोग के लिए किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह भारत और रूस के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी का एक बड़ा उदाहरण है। इससे दोनों देशों के बीच सैन्य तालमेल और सहयोग और भी बेहतर होगा।
उत्तर कोरिया की मिसाइलें और जापान की बदली नीति
इस बीच, उत्तर कोरिया ने एक बार फिर बैलिस्टिक मिसाइलें दागकर अपनी सैन्य ताक़त का प्रदर्शन किया है। मिसाइलें पूर्वी तट के सिनपो शहर के पास से समुद्र की ओर दागी गईं और करीब 140 किमी तक गईं। यह इस महीने का चौथा और साल का सातवां मिसाइल परीक्षण है। दक्षिण कोरिया ने इसे उकसावे वाला कदम बताया है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई है।
जहाँ तक बात है जापान की, तो उसने भी अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव किया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद शांतिवादी नीति अपनाने वाला जापान अब हथियारों का निर्यातक बनने की तैयारी में है। सरकार ने हथियार निर्यात के नियमों में ढील देने का फ़ैसला किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण हथियारों की मांग बढ़ी है, और कई देश जापान की ओर देख रहे हैं। यह अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। जापान का रक्षा बजट भी तेज़ी से बढ़कर करीब 60 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।
देखना यह है कि भारत-रूस का यह समझौता और जापान की बदली हुई नीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति में क्या बदलाव लाते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर अपनी नज़रें बनाए हुए है।
🔍 खबर का विश्लेषण
भारत और रूस का यह समझौता एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी का संकेत है, लेकिन यह देखना होगा कि इससे पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंधों पर क्या असर पड़ता है। जापान का हथियार निर्यातक बनना एशिया में शक्ति संतुलन को बदल सकता है, जिससे चीन की चिंता बढ़ सकती है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ भारत और रूस के इस समझौते का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को बढ़ाना है, ताकि वे शांति के समय ट्रेनिंग और संयुक्त अभ्यास कर सकें।
❓ जापान की नई हथियार निर्यात नीति से किस देश को सबसे ज़्यादा चिंता हो सकती है?
जापान की नई हथियार निर्यात नीति से चीन को सबसे ज़्यादा चिंता हो सकती है, क्योंकि इससे एशिया में शक्ति संतुलन बदलने की आशंका है।
❓ उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों का अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और शांति भंग होने का खतरा रहता है।
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Published: 19 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow.in

