📅 30 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने EWS कोटे में एडमिशन रोकने वाले प्राइवेट स्कूलों को फटकार लगाई।
- कोर्ट ने कहा, शिक्षा का अधिकार एक राष्ट्रीय मिशन है, इसे कमजोर नहीं किया जा सकता।
- प्राइवेट स्कूलों को 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होंगी।
📋 इस खबर में क्या है
क्या कोई स्कूल गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्राइवेट स्कूल, आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों कोटे के तहत एडमिशन देने से इनकार नहीं कर सकते। ऐसा करना, बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा, जो संविधान के आर्टिकल 21A में दिया गया है।
लखनऊ के स्कूल की याचिका खारिज
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने लखनऊ पब्लिक स्कूल की एक अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। स्कूल ने एक छात्रा को EWS कोटे में एडमिशन देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले स्कूल को एडमिशन देने का आदेश दिया था, लेकिन स्कूल ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
स्कूल का कहना था कि छात्रा की योग्यता पर उन्हें संदेह है, जबकि उसका नाम राज्य की फाइनल लिस्ट में था। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ‘राइट ऑफ चिल्ड्रेन टू फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन एक्ट 2009’ (RTE) सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ है। इसके तहत, प्राइवेट स्कूलों को अपनी 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होंगी।
शिक्षा में समानता और समावेशिता
सबसे बड़ी बात यह है कि कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नियम सिर्फ नियम नहीं है, बल्कि बच्चों में समानता, गरिमा और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए है। RTE में ‘नेबरहुड स्कूल’ का कॉन्सेप्ट इसीलिए लाया गया था, ताकि आसपास के बच्चों को साथ पढ़ाया जा सके और सामाजिक दूरी और भेदभाव को खत्म किया जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एडमिशन में देरी या इनकार बच्चे की पढ़ाई को रोकता है और उसके मौलिक अधिकार को कमजोर करता है। यही वजह है कि , स्कूल को पहले एडमिशन देना चाहिए और बाद में अगर कोई आपत्ति है तो उसे उठाना चाहिए।
25% सीटें किसके लिए?
2009 में पास हुए RTE एक्ट के सेक्शन 12(1)(c) के अनुसार, प्राइवेट नॉन-एडेड स्कूलों में कम से कम 25% सीटें आरक्षित श्रेणियों के लिए रखी गई हैं। इन 25% सीटों में EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग), DG (वंचित समूह) और CWSN (विशेष आवश्यकता वाले बच्चे) शामिल हैं। EWS और DG के लिए 22% सीटें आरक्षित हैं, जबकि CWSN के लिए 3% सीटें रिजर्व हैं। इन बच्चों की स्कूल फीस का भुगतान राज्य सरकारें करती हैं।
एडमिशन प्रक्रिया क्या है?
25% कोटे के तहत एडमिशन के लिए पैरेंट्स को ऑनलाइन फॉर्म भरना होता है। इसके बाद, सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, बच्चों का चयन किया जाता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्राइवेट स्कूलों के लिए एक कड़ा संदेश है। देखना यह है कि स्कूल इस फैसले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में कितना सहयोग करते हैं। यह फैसला शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
क्या बदलेगा?
इस फैसले से EWS कोटे के तहत एडमिशन लेने वाले छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी। अब स्कूलों को मनमानी करने का मौका नहीं मिलेगा और उन्हें हर हाल में गरीब बच्चों को एडमिशन देना होगा। यह फैसला उन लाखों बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है, जो गरीबी के कारण अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।
🔍 खबर का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे गरीब और वंचित बच्चों को बेहतर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा, जिससे वे समाज में आगे बढ़ सकेंगे। हालांकि, यह देखना होगा कि स्कूल इस फैसले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और इसका पालन करते हैं।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ EWS कोटे में कौन से बच्चे आते हैं?
EWS कोटे में वे बच्चे आते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है और जो सरकार द्वारा निर्धारित आय सीमा के अंतर्गत आते हैं।
❓ RTE एक्ट क्या है?
RTE एक्ट, यानी राइट टू एजुकेशन एक्ट, 2009 में पास हुआ था। इसके तहत, 6 से 14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।
❓ प्राइवेट स्कूलों में EWS के लिए कितनी सीटें आरक्षित हैं?
प्राइवेट स्कूलों में EWS, DG और CWSN बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित हैं। इसमें EWS और DG के लिए 22% और CWSN के लिए 3% सीटें शामिल हैं।
❓ एडमिशन के लिए अप्लाई कैसे करें?
EWS कोटे के तहत एडमिशन के लिए पैरेंट्स को ऑनलाइन फॉर्म भरना होता है। इसके बाद, सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बच्चों का चयन किया जाता है।
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Published: 30 अप्रैल 2026 | HeadlinesNow.in

