📅 12 जुलाई 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- नई रिसर्च ने यूट्यूब, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट के बाल सुरक्षा फीचर्स की पोल खोली, जो प्रभावी नहीं पाए गए।
- अजनबियों से बचाने, निजीपन बनाए रखने, और स्क्रीन टाइम नियंत्रित करने के दावे झूठे साबित हुए हैं।
📋 इस खबर में क्या है
पिछले कुछ समय से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक गहरी चिंता बनी हुई है। अभिभावक हमेशा चाहते हैं कि उनके बच्चे डिजिटल दुनिया की बुराइयों से बचे रहें, और इसी को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर नए सुरक्षा फीचर्स लाने का दावा करती हैं। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसी बड़ी कंपनियों ने किशोरों के लिए कई फीचर्स शुरू किए हैं, उनका कहना है कि इनसे बच्चों को अजनबियों, आपत्तिजनक सामग्री और ऑनलाइन लत से दूर रखा जा सकेगा। मगर, न्यूयॉर्क और नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के एक ताज़ा शोध ने इन सभी दावों की पोल खोल दी है। मैदान से खबर बटोरने वाले हम जैसे पत्रकार जानते हैं कि जमीनी हकीकत अक्सर कागज़ी बातों से अलग होती है, और यह रिपोर्ट कुछ ऐसा ही दिखा रही है।
दावों और हकीकत का फर्क
शोधकर्ताओं ने इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध सुरक्षा फीचर्स की बारीकी से जांच की। नतीजे चौंकाने वाले हैं – कई फीचर या तो ठीक से काम ही नहीं करते, कुछ को चंद सेकंड में बायपास किया जा सकता है, वहीं कुछ तो सिर्फ वादों तक ही सिमटे दिखते हैं। यह साफ दिखाता है कि तकनीक के इन बड़े खिलाड़ियों के दावे और उनकी असल कार्यप्रणाली में कितना बड़ा फासला है। यह सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि लाखों बच्चों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर सवाल है।
स्नैपचैट ने 2023 में ऐलान किया था कि अब किशोर सिर्फ अपने ‘म्यूचुअल फ्रेंड्स’ यानी ऐसे लोगों को ही दिखेंगे जिन्हें वे और उनके दोस्त जानते हों। यह एक अच्छा कदम लग रहा था, लेकिन रिसर्च में यह सामने आया कि अगर किसी के पास किशोर का यूजरनेम हो, तो वह आसानी से उसके अकाउंट तक पहुँच सकता है। इतना ही नहीं, स्नैपचैट खुद भी किशोरों को ऐसे वयस्कों की प्रोफाइल सुझा रहा था, जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं था। यह सुरक्षा के नाम पर धोखा जैसा लगता है।
इंस्टाग्राम का निजीपन, एल्गोरिदम की अनदेखी
मेटा ने जब किशोरों के लिए ‘टीन अकाउंट’ लॉन्च किए, तब दावा किया गया कि ऐसे अकाउंट अपने आप प्राइवेट रहेंगे और अनचाहे संपर्क कम होंगे। शोधकर्ताओं ने एक बच्ची का नया अकाउंट बनाकर इसे परखा। ‘सजेस्टेड फॉर यू’ सेक्शन में जो प्रोफाइल दिखीं, उनमें लगभग सभी ऐसे वयस्क पुरुषों की थीं, जिन्हें वह बच्ची जानती भी नहीं थी। यह सीधे तौर पर निजीपन के दावों की धज्जियां उड़ाता है, जहां एल्गोरिदम खुद ही अनचाहे लोगों को जोड़ने का काम कर रहा था।
यूट्यूब की सीमाएं, खुद ही तोड़ने के तरीके
यूट्यूब किशोरों के लिए 60 मिनट की स्क्रीन टाइम लिमिट और ‘टेक अ ब्रेक’ रिमाइंडर जैसी सुविधाएँ देता है। लेकिन रिसर्च में पता चला कि समय पूरा होते ही, यूट्यूब खुद ही बच्चे को ‘आज के लिए लिमिट इग्नोर करो’ या ‘लिमिट बदल लो’ जैसे विकल्प सुझाने लगता है। मतलब, एक तरफ आप सुरक्षा का दावा कर रहे हैं, दूसरी तरफ बच्चों को ही नियम तोड़ने के लिए उकसा रहे हैं। हाँ, यूट्यूब का कहना है कि अगर माता-पिता फैमिली लिंक के जरिए टाइम सेट करें तो बच्चे उसे बदल नहीं सकते, पर क्या हर अभिभावक को इन बारीक तकनीक की जानकारी होती है?
ये सुरक्षा फीचर कई बार इतने जटिल मेन्यू में छिपे होते हैं, कि सामान्य अभिभावकों को उनकी जानकारी ही नहीं होती। कुछ महत्वपूर्ण फीचर्स डिफॉल्ट रूप से चालू भी नहीं होते, जिससे उनकी प्रभावशीलता और कम हो जाती है। यह एक गंभीर मुद्दा है, जब सुरक्षा के उपकरण तो हों, पर उनका इस्तेमाल करना ही मुश्किल हो जाए।
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह
इन आरोपों के जवाब में, मेटा ने कहा कि ‘टीन अकाउंट’ लागू होने के बाद किशोर अब कम संवेदनशील सामग्री देख रहे हैं, रात में इंस्टाग्राम पर कम समय बिता रहे हैं, और अनचाहे संपर्क भी घटे हैं। हाँ, ये ज़रूर है कि मेटा की पूर्व मनोवैज्ञानिक एनेके बफोन का कहना है कि समस्या कमजोर सुरक्षा टूल्स की है। उनके अनुसार, “कई बार ये टूल या तो अधूरे होते हैं, या इतने जटिल कि उनका पूरा फायदा मिल ही नहीं पाता। इन्हें और सख्त बनाने की ज़रूरत है।” यह बात सीधे तौर पर कंपनियों की मंशा पर सवाल खड़े करती है, क्या वे वाकई बच्चों की सुरक्षा को गंभीरता से ले रही हैं या सिर्फ दिखावा कर रही हैं?
इन शोधों से एक बात तो साफ है, कि डिजिटल दुनिया में बच्चों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सिर्फ अभिभावकों की नहीं है। तकनीक बनाने वाली कंपनियों को भी अपने दावों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। सिर्फ नए फीचर्स लॉन्च कर देने से बात नहीं बनती, उन्हें प्रभावी और इस्तेमाल करने में आसान बनाना भी उतना ही ज़रूरी है। बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कंपनियों को अब अपनी तकनीक और पारदर्शिता, दोनों में सुधार करना होगा।
🔍 खबर का विश्लेषण
यह शोध दिखाता है कि बड़ी टेक कंपनियाँ बच्चों की सुरक्षा को लेकर सिर्फ कागज़ी दावे कर रही हैं। यह अभिभावकों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर अधिक ध्यान देना होगा। सरकारों और नियामक संस्थाओं को इन प्लेटफॉर्म्स पर और कड़ी निगरानी रखनी चाहिए, ताकि बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित किया जा सके। केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी सुरक्षा उपाय ही असली समाधान हैं।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ इस रिसर्च में किन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को शामिल किया गया है?
इस रिसर्च में मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के सुरक्षा फीचर्स की जाँच की गई है, जो बच्चों और किशोरों द्वारा खूब इस्तेमाल होते हैं।
❓ स्नैपचैट के सुरक्षा फीचर्स में क्या खामी पाई गई है?
स्नैपचैट ने कहा था कि किशोर सिर्फ परिचित लोगों को दिखेंगे, लेकिन रिसर्च में पता चला कि यूजरनेम से कोई भी उनका अकाउंट खोज सकता है। स्नैपचैट खुद भी ऐसे वयस्कों की प्रोफाइल सुझा रहा था जिनसे किशोरों का कोई संबंध नहीं था।
❓ यूट्यूब की स्क्रीन टाइम लिमिट को लेकर क्या समस्या उजागर हुई है?
यूट्यूब अपनी स्क्रीन टाइम लिमिट पूरा होने पर खुद ही बच्चों को उसे अनदेखा करने या बदलने का विकल्प दिखाता है, जिससे लिमिट तय करने का मकसद ही खत्म हो जाता है, जब तक कि माता-पिता फैमिली लिंक का उपयोग न करें।
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Published: 12 जुलाई 2026 | HeadlinesNow.in

