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पुरी रथयात्रा: 220 कारीगरों की तपस्या, एक पहिया बिकता है 3 लाख में

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धर्म
📅 16 जुलाई 2026 | HeadlinesNow Desk
पुरी रथयात्रा: 220 कारीगरों की तपस्या, एक पहिया बिकता है 3 लाख में - HeadlinesNow Hindi News

🔑 मुख्य बातें

  • भगवान जगन्नाथ के रथ का एक पहिया यात्रा के बाद 3 लाख रुपए तक में बिकता है, जो इस परंपरा की अनूठी पहचान है।
  • 220 कारीगर 87 दिनों में 13 तरह की लकड़ियों से रथ बनाते हैं, जिसमें पीढ़ियों से चली आ रही माप और हुनर का इस्तेमाल होता है।

क्या आप जानते हैं कि जिस भव्य रथ पर सवार होकर भगवान जगन्नाथ आज पुरी की सड़कों पर निकल रहे हैं, उसका एक पहिया यात्रा खत्म होने के बाद तीन लाख रुपए तक में बिकता है? यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, अतुलनीय शिल्प कौशल और गहरी आस्था का संगम है, जो हर साल ओडिशा के पुरी में जीवंत होता है। आज, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग रथों में सवार होकर अपने मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर पहुंचेगे। यह देवताओं का एक अनोखा सफर है, जहां वे सात दिन तक विश्राम करेंगे और फिर 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा के साथ मुख्य मंदिर लौटेंगे। मंदिर में प्रवेश से पहले, देवता दो दिन तक रथों पर ही रहेंगे, एक ऐसा नजारा जो लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है।

परंपरा और समर्पण का संगम: रथों का निर्माण

इस महान यात्रा के लिए तीन रथों का निर्माण कोई साधारण काम नहीं। — जो कि उम्मीद से अलग है — इसके पीछे 87 दिनों की अथक मेहनत और 220 कारीगरों की पीढ़ियों पुरानी तपस्या छिपी होती है। वसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा से शुरू हुआ यह सिलसिला, रामनवमी पर तीन धौरा लट्ठों की चिराई के साथ रफ्तार पकड़ता है और अक्षय तृतीया से रथों का ढांचा खड़ा होना शुरू हो जाता है। ओडिशा वन विभाग बिना किसी कीमत के 13 तरह की लकड़ियां मुहैया कराता है, जिनमें फासी, धौरा, आसन, मोई, सिमिली, साल, गम्भारी, कदंब और देवदारु जैसी प्रजातियां शामिल हैं। सरकार तो भविष्य के लिए जंगल प्रोजेक्ट भी चला रही है ताकि रथों के लिए लकड़ी की कमी न हो। यह दिखाता है कि इस महान `धर्म` को बचाने के लिए कैसे हर स्तर पर प्रयास हो रहे हैं।

सबसे दिलचस्प बात है रथों के निर्माण का तरीका— कोई आधुनिक नक्शा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही करीब 20 इंच की खास छड़ी और रस्सी से हर हिस्सा नापा जाता है। कारीगर पहले पहिए बनाते हैं, फिर नीचे से ऊपर की ओर पूरा ढांचा खड़ा करते हैं। यह ज्ञान एक परिवार से दूसरे परिवार, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होता है। युवा कारीगर ‘रथखला’ में बड़े उस्तादों के साथ काम करके यह हुनर सीखते हैं। जब रथ तैयार हो जाते हैं, तब सरकारी इंजीनियर उनकी अंतिम सुरक्षा जांच करते हैं, पहियों, धुरी और जोड़ों को परखते हैं। फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही इन्हें यात्रा के लिए हरी झंडी मिलती है। यह सिर्फ एक लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि आस्था और विज्ञान का एक अनूठा मेल है।

देवताओं का अलौकिक सफर: रथयात्रा की अनूठी रस्में

रथयात्रा में तीन रथ होते हैं, लेकिन प्रतिमाएं चार होती हैं— भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और भगवान सुदर्शन (चक्र)। रथयात्रा वाले दिन देवताओं को मंदिर से बाहर रथों तक लाने की परंपरा को ‘पहांडी’ कहते हैं, जहां सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ आते हैं। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों को साफ करते हैं और सुगंधित जल छिड़कते हैं— इसे ‘छेरा-पहरा’ कहा जाता है। गजपति महाराज को मंदिर का सबसे बड़ा सेवक माना जाता है। यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ चलता है, फिर सुभद्रा का और अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ। हजारों भक्त मोटी रस्सियों से इन विशाल रथों को करीब दो किलोमीटर तक खींचकर गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। यह दृश्य सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में `धर्म` के प्रति अटूट विश्वास का एक शानदार उदाहरण पेश करता है।

यात्रा पूरी होने के बाद, ये रथ तुरंत नहीं खोले जाते। मंदिर प्रशासन इसकी तारीख तय करता है और पारंपरिक भोई सेवक यह काम करते हैं। लगभग 20 दिनों में रथों को खोल दिया जाता है और उनके कुछ हिस्से बेचे जाते हैं। जैसा कि हमने पहले बताया, 2025 में भगवान जगन्नाथ के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपए थी, जबकि बलभद्र के रथ का पहिया 2 लाख और सुभद्रा का 1.5 लाख रुपए में बिका था। यह सिर्फ लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है। इन हिस्सों को खरीदने वाले मानते हैं कि यह उनके घरों में सुख-समृद्धि और भगवान का आशीर्वाद लाएगा। यह परंपरा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि एक आर्थिक चक्र भी चलाती है, जो कारीगरों और सेवकों को सदियों से पोषित करता आ रहा है।

🔍 खबर का विश्लेषण

जगन्नाथ रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्प और सामुदायिक एकता का जीवंत प्रमाण है। रथों के निर्माण से लेकर उनकी बिक्री तक, यह आयोजन सदियों पुराने ज्ञान, कला और आस्था को संरक्षित रखता है। यह न केवल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है, कारीगरों और सेवकों को आजीविका प्रदान करता है। यह दिखाता है कि कैसे धर्म और परंपराएं आधुनिक युग में भी समाज और संस्कृति को गहराई से प्रभावित करती हैं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

❓ गुंडिचा मंदिर का क्या महत्व है?

गुंडिचा मंदिर को लोक परंपरा में भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर कहा जाता है। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा यहां सात दिनों तक विश्राम करते हैं, जो इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

❓ रथयात्रा के रथों का निर्माण कैसे होता है?

रथों का निर्माण 87 दिनों में 220 कारीगरों द्वारा होता है। यह काम बसंत पंचमी पर लकड़ी की पूजा से शुरू होता है। इसमें 13 तरह की लकड़ियों का इस्तेमाल होता है और आधुनिक नक्शे की बजाय पीढ़ियों पुरानी माप और हुनर से इन्हें बनाया जाता है।

❓ पहांडी और छेरा-पहरा रस्में क्या हैं?

पहांडी वह परंपरा है जब देवताओं की मूर्तियों को मंदिर से रथों तक लाया जाता है। छेरा-पहरा में पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों को साफ करते हैं और सुगंधित जल छिड़कते हैं, यह मंदिर के सबसे बड़े सेवक की सेवा है।

❓ रथयात्रा के पहिए क्यों बेचे जाते हैं?

यात्रा पूरी होने के बाद रथों को खोला जाता है और उनके कुछ हिस्से, खासकर पहिए, भक्तों को बेचे जाते हैं। श्रद्धालु इन्हें अपने घर में भगवान के आशीर्वाद और सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में रखते हैं, जिससे यह परंपरा एक आर्थिक महत्व भी रखती है।

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Published: 16 जुलाई 2026 | HeadlinesNow.in

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