📅 19 जुलाई 2026 | HeadlinesNow Desk
🔑 मुख्य बातें
- ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर खामेनेई के अंतिम संस्कार में पत्थर फेंके गए, उन्हें ‘गद्दार’ कहा गया।
- कट्टरपंथी गुट मौजूदा सरकार पर अमेरिका के सामने झुकने और ईरान के सिद्धांतों से समझौता करने का आरोप लगा रहे हैं।
- नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई की गैरमौजूदगी में मौजूदा सरकार पर सत्ता हथियाने का आरोप है, जिससे आंतरिक संघर्ष बढ़ रहा है।
📋 इस खबर में क्या है
तेहरान की सरजमीं पर इन दिनों राजनीतिक गर्माहट कुछ ज्यादा ही महसूस की जा रही है। अमेरिका के साथ हुए संघर्ष विराम समझौते के बाद ईरान के भीतर का सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। पिछले हफ्ते सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में जो कुछ हुआ, उसने इस तनाव को और हवा दे दी। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ पर कट्टरपंथी धड़े ‘सॉफ्ट कूप’ यानी बिना हथियारों के सत्ता पलटने की साजिश रचने का आरोप लगा रहा है। उनका साफ कहना है कि इन नेताओं ने अमेरिका से हाथ मिलाकर ईरान के मूल सिद्धांतों से समझौता किया है।
CNN की एक रिपोर्ट बताती है कि तेहरान में आयोजित खामेनेई के जनाजे के दौरान यह गुस्सा चरम पर था। जब राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ताबूत के साथ चल रहे थे, तब काले कपड़ों में कुछ लोग उनके खिलाफ नारे लगाने लगे। वहीं, अंतिम संस्कार स्थल से थोड़ी ही दूर पर विदेश मंत्री अब्बास अराघची को पत्थरों का सामना करना पड़ा और उन्हें ‘देश बेचने वाला गद्दार’ कहकर पुकारा गया। हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें वहां से जान बचाकर भागना पड़ा। यह घटनाक्रम बताता है कि ईरान के भीतर गहरे मतभेद अब सड़क पर आ चुके हैं।
अमेरिका से समझौते पर कट्टरपंथियों का आक्रोश
कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि मौजूदा सरकार ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के बजाय अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए और समझौता कर लिया। उनका तर्क है कि यह समझौता नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के आदेशों के विपरीत है। एक बड़ी विडंबना यह है कि मुजतबा खामेनेई अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। उन्होंने न तो देश को संबोधित किया है और न ही अपनी सत्ता का खुले तौर पर प्रदर्शन किया है, जबकि उनके नाम पर सरकार बातचीत भी कर रही है और देश भी चला रही है।
कट्टरपंथियों का आरोप है कि मुजतबा की इस गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर वर्तमान सरकार अपनी ताकत बढ़ाने में जुटी है। वे संसद को कमजोर करना चाहते हैं, ऐसी बातें भी खुलेआम कही जा रही हैं। मुजतबा खामेनेई के सार्वजनिक तौर पर नजर न आने के कारण राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची युद्ध के बाद ईरान के सबसे प्रमुख चेहरों के रूप में उभरे हैं। कट्टरपंथियों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यही है, उन्हें लगता है कि यह तिकड़ी देश को गलत दिशा में ले जा रही है।
युद्धविराम टूटने और समुद्री झड़पें
अंतिम संस्कार में कट्टरपंथी गुटों ने अमेरिका के खिलाफ फिर से युद्ध छेड़ने की मांग उठाई थी और ट्रम्प सरकार के साथ हुए किसी भी समझौते को खारिज करने की बात कही थी। उनकी यह इच्छा कुछ ही दिनों बाद पूरी होती दिखी, जब ईरान और अमेरिका के बीच हुआ नाजुक युद्धविराम लगभग टूट गया। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को निशाना बनाकर इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपना नियंत्रण दिखाने की कोशिश की। इसके जवाब में अमेरिका ने भी तुरंत जवाबी हमले किए, जिससे इस पूरे क्षेत्र में एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है। यह घटना दर्शाती है कि मध्य-पूर्व में अंतरराष्ट्रीय शांति कितनी भंगुर है।
राष्ट्रपति को मिली खुली धमकी
यह तनातनी कोई नई नहीं है। युद्ध दोबारा शुरू होने से पहले भी कट्टरपंथी नेता अमेरिका से समझौता करने वाले अधिकारियों पर लगातार हमला बोल रहे थे। ईरानी शासन से जुड़े एक धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने तो एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति मसूद पजशकियान को खुलेआम जान से मारने की धमकी दे डाली थी। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा, “राष्ट्रपति महोदय, अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो हमारी तलवार होगी और आपका गला होगा। हम आपकी जिंदगी को जहन्नुम बना देंगे।” राष्ट्रपति को मिली इस खुली धमकी की ईरान में काफी आलोचना हुई, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बख्शी के खिलाफ किसी कानूनी कार्रवाई की कोई खबर सामने नहीं आई। यह दिखाता है कि कट्टरपंथी धड़े की पकड़ कितनी मजबूत है और वे कितना बेखौफ होकर अपनी बात रख सकते हैं।
ईरान में यह अंदरूनी टकराव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि देश के भविष्य की दिशा तय करने वाला भी है। एक तरफ कट्टरपंथी हैं जो अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को राष्ट्रीय अस्मिता पर हमला मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ वो सरकार है जो मौजूदा हालातों में कुछ रियायतें देने को तैयार दिख रही है। इस खींचतान का असर न सिर्फ ईरान की घरेलू राजनीति पर, बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर पड़ेगा। आगे आने वाले दिन ईरान के लिए और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
🔍 खबर का विश्लेषण
ईरान के भीतर पनप रहा यह टकराव देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कट्टरपंथियों का मुखर विरोध और सरकार के शीर्ष नेताओं को मिली धमकियां बताती हैं कि देश एक गहरे ध्रुवीकरण की चपेट में है। मुजतबा खामेनेई की पर्दे के पीछे की भूमिका ने भी मौजूदा नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं, जिससे सत्ता का संतुलन और बिगड़ सकता है। इस स्थिति का सीधा असर ईरान की अंतरराष्ट्रीय छवि और परमाणु समझौते जैसी वैश्विक वार्ताओं पर भी पड़ेगा।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ ईरान में ‘सॉफ्ट कूप’ का आरोप क्यों लगाया जा रहा है?
ईरान के कट्टरपंथी धड़े का आरोप है कि राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका से समझौता कर ईरान के सिद्धांतों से समझौता किया है, जिसे वे बिना हथियारों का सत्ता पलटने का प्रयास मानते हैं।
❓ सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में क्या हुआ?
अंतिम संस्कार के दौरान राष्ट्रपति पजशकियान के खिलाफ नारे लगाए गए। वहीं, विदेश मंत्री अराघची पर पत्थर फेंके गए और उन्हें ‘देश बेचने वाला गद्दार’ कहकर संबोधित किया गया, जिससे उन्हें वहां से भागना पड़ा।
❓ नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई की भूमिका पर क्या सवाल हैं?
मुजतबा खामेनेई अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं, न ही उन्होंने देश को संबोधित किया है। कट्टरपंथियों का आरोप है कि उनकी इस गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर मौजूदा सरकार अपनी ताकत बढ़ाने और संसद को कमजोर करने में जुटी है।
❓ राष्ट्रपति पजशकियान को किस तरह की धमकी मिली थी?
एक धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति पजशकियान को जान से मारने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो ‘हमारी तलवार होगी और आपका गला होगा’।
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Published: 19 जुलाई 2026 | HeadlinesNow.in

